Kahani: किस्मत या मेहनत

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Kahani: किस्मत या मेहनत

बहुत से लोग असफल होने या हार जाने पर अपनी

किस्मत को कोसते हैं और जब अपने आस-पास

सफल लोगों से मिलते हैं तो अक्सर यही सोचते हैं

कि इनकी किस्मत बड़ी अच्छी है जो ये लोग अपनी

फील्ड में एक कामयाब इंसान हैं। लेकिन क्या यही

वास्तविकता है?। दरअसल, सिर्फ भाग्यवादी लोग ही

अपनी किस्मत की दुहाई देते हैं। जब हम अपने

जीवन में किसी लक्ष्य को पाने के लिए कठोर श्रम

करते हैं तो हमारे विचार तो पॉज़िटिव बनते ही हैं

हमारे सारे कर्म और प्रयास भी पॉज़िटिव होने लगते

हैं। ऐसे में, चाहे हमारे जीवन में कितने ही संकट

आयें हम उनसे घबराये बिना लगातार अपना कठोर

परिश्रम जारी रखते हैं और जिसके फलस्वरूप हम

अपने करियर गोल्स या अन्य लक्ष्य पाने में कामयाब

हो जाते हैं और तब हमारी किस्मत भी हमारा साथ

देती है। इसलिए, अब जब कभी आप किसी कामयाब

इंसान से मिलें तो यह जरुर ध्यान रखना कि इस

इंसान ने खूब मेहनत करके सफलता हासिल की है

और फिर, इसकी किस्मत ने इसका साथ दिया है।

आत्मनिर्भर बने

घर के बुजुर्ग मुखिया की आंख में तकलीफ रहने लगी। एक डॉक्टर उनके घर आए और बुजुर्ग को आंख का ऑपरेशन कराने की सलाह दी। उस बुजुर्ग ने कहा आंख बनवाने में बेकार पैसे खर्च होंगे, परहेज रखना पड़ेगा आदि-आदि, मेरी तो ऐसे ही ठीक है। थोड़े दिन बाद उनकी आंख में ज्यादा तकलीफ रहने लगी, वो डॉक्टर फिर उनके घर आए। बोले- बाबा अब तो ऑपरेशन करवा लो नहीं तो बाद में ज्यादा तकलीफ होगी। वो बोला- मुझे क्या जरूरत है। मेरे चार बेदे हैं, चार बहुएं हैं, पोते-पोती है। ये सब मेरी आँखें ही तो है। कोई न कोई हमेशा मेरे पास बैठा ही रहता है। एक दिन घर में आग लग गईं। सब के सब निकलकर बाहर भाग गए, बूढे आदमी को किसी ने नहीं निकाला। तभी एक पड़ोसी ने आकर उसे निकाला, तब तक वो काफी झुलस चुका था। खैर उसकी जान बच गई। बूढ़ा आदमी सोचता है आज अपनी आंख होती तो कितना अच्छा होता, काश डॉक्टर की बात मान ली होती। वो डॉक्टर और कोई नहीं गुरु था जो उसे चेताने आया था। पर आदमी मानता कहा है? उसे तो अपने रिश्तेदारों पर, दोस्तों पर, पैसे पर घमंड होता है। जबकि आदमी को स्वयं पर आत्मनिर्भर होना चाहिए। शरीर से भी किसी की सेवा की जरूरत ना पड़े और पैसे के लिए भी किसी के आगे हाथ ना फैलाना पड़े। जीवन के अंतिम भाग तक कमाते रहो।

भीतरी बात-गहरी बात-मांगो उसी से जो दे खुशी से और कहो उसी से जो कहे ना किसी से।

समय और सफलता 

सफलता के लिए अथवा किसी कार्य के संपन्न होने के लिए पांच बातों

की आवश्यकता होती है. सबसे पहले उस व्यक्ति का आशय जो उसे

कर रहा है, फिर उन साधनों और चीजों की उपलब्धता जिससे वह कार्य होना

है, तीसरी बात उस कार्य को करने का मनोभाव और उसे करने की इच्छा. फिर

उसे करने का समय, क्योंकि प्रत्येक कार्य को करने का एक निर्धारित समय

होता है, और यदि उसे सही समय पर नहीं किया जाये तो वह व्यर्थ हो जाता है.

यदि आप फरवरी में बीज बोयेंगे, तो उसका कोई अर्थ नहीं है. फिर आप यह

नहीं कह सकते कि मैंने बीज को बोया, परंतु कुछ उगा नहीं. आप को बारिश

के बाद अप्रैल तक का इंतजार करना होगा और फिर यदि बीज को बोयेंगे, तो

सकारात्मक परिणाम सामने आयेंगे. इसलिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है.

इस बात को समझना होगा कि समय कैसे महत्वपूर्ण है और उसके बाद दैविक

कृपा जरूरी है. दैविक कृपा के बिना सफलता संभव नहीं है, इसलिए आप

सेवा, साधना और सत्संग करें. प्रयासों का सफल परिणाम समय पर मिलेगा.

आपके द्वारा किये गये प्रयासों के परिणाम कभी भी व्यर्थ नहीं जायेंगे. यदि अभी

नहीं तो निश्चित ही उसके परिणाम बाद में मिल ही जायेंगे. संपत्ति होने का अर्थ

सिर्फ धन या पैसा होना नहीं है. आपके पास धन का भंडार, काफी जमीन-

जायदाद भी हो सकता है, परंतु यदि आपका चेहरा तनावग्रस्त और दुखी लगे,

तो कोई भी आपको समृद्ध और सुखी नहीं कह सकता. समृद्धि का अर्थ बैंकों

में बड़ी पूंजी जमा होना नहीं होता है. समृद्धि का तात्पर्य होता है जीवन की

विशालता को समझकर उसका सम्मान करना. किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास

उसकी समृद्धि को दर्शाता है. संपत्ति आपके आत्मविश्वास को बढ़ाती है, पर यदि

संपत्ति ने आपको कमजोर एवं बीमार कर दिया है तथा आपके जीवन में द्वंद्व को

उत्पन्न किया है, तो फिर वह संपत्ति व्यर्थ है! समय, ज्ञान, विवेक, स्वास्थ्य,

आत्मविश्वास और वीरता भी संपत्ति हैं. यदि आपमें आत्मविश्वास है, तो आप

किसी भी परिस्थिति को संभाल सकते हैं और यह भी एक प्रकार की संपत्ति है.

लक्ष्य और आत्मविस्वाश 

एक व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है. किंतु उसकी सारी उपलब्धि बेकार

हो जायेगी, यदि उसे अपने लक्ष्य की जानकारी न हो. इसलिए प्रत्येक

मनुष्य का अपना जीवन-दर्शन होना चाहिए. इसके बिना प्रगति असंभव है.

साथ ही साथ किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ आत्मविश्वास होना बहुत

जरुरी है. जैसे – ‘मैं इस कार्य को करूंगा’, ‘मुझे निश्चय ही इस कार्य को

करना है’ इस तरह का दृढ़ आत्मविश्वास ही मानव जीवन में सफलता का

रहस्य है. भगवान बुद्ध ने इसे दूसरा महत्वपूर्ण तत्व कहा है. यह सफलता

के लिए दूसरा आवश्यक तत्व है, जिसे प्रत्येक को अपने जीवन में उतारना

चाहिए. एक व्यक्ति जब जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपने को व्यक्त करता

है, उसे अपनी वाणी के ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. हमें अपने चक्षुओं

पर भी उचित नियंत्रण रखना चाहिए. जिन वस्तुओं को देखने से हमारे मन

पर अशुभ प्रभाव पड़ता है, उन्हें नहीं देखना चाहिए. जो बातें हमारे मन पर

बुरा प्रभाव डालती हैं, उनसे दूर रहना चाहिए. बहुत से लोग अपने शरीर

को मजबूत बनाने के लिए कई तरह के शारीरिक व्यायाम करते हैं, किंतु

मानव अस्तित्व सिर्फ शारीरिक नहीं है. मानव अस्तित्व शारीरिक, मानसिक

और आध्यात्मिक तीनों है. शारीरिक व्यायाम भी अच्छा है, किंतु इसके

साथ-साथ हमें मानसिक व्यायाम तथा आत्मिक व्यायाम भी करना चाहिए.

अगला महत्वपूर्ण तत्व है, ‘अच्छे तरीके से कार्य करना’. जब भी हम

कोई कार्य शुरू करते हैं, तब हमें बहुत कुशलतापूर्वक और सुंदर तरीके से

उसका समापन भी करना चाहिए. हमें किसी भी कार्य को अपूर्ण अवस्था में

नहीं छोड़ना चाहिए. अगला उपदेश है स्मृति. स्मृति क्या है? इष्टमंत्र का जप

हमेशा दोहराते रहना चाहिए. हमें कभी भी परमात्मा का स्मरण करना और

अपने इष्टमंत्र का जप करना नहीं भूलना चाहिए. यह हमारा परम कर्तव्य

है. जब हम किसी संगीत की उत्कृष्ट, मनोरम स्वर लहरी को सुनते हैं, तब

हमारा विषयी मन उस संगीत में खो जाता है.

कर्म बड़ा या भाग्य 

एक व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है. किंतु उसकी सारी उपलब्धि बेकार

हो जायेगी, यदि उसे अपने लक्ष्य की जानकारी न हो. इसलिए प्रत्येक

मनुष्य का अपना जीवन-दर्शन होना चाहिए. इसके बिना प्रगति असंभव है.

साथ ही साथ किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ आत्मविश्वास होना बहुत

जरुरी है. जैसे – ‘मैं इस कार्य को करूंगा’, ‘मुझे निश्चय ही इस कार्य को

करना है’ इस तरह का दृढ़ आत्मविश्वास ही मानव जीवन में सफलता का

रहस्य है. भगवान बुद्ध ने इसे दूसरा महत्वपूर्ण तत्व कहा है. यह सफलता

के लिए दूसरा आवश्यक तत्व है, जिसे प्रत्येक को अपने जीवन में उतारना

चाहिए. एक व्यक्ति जब जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपने को व्यक्त करता

है, उसे अपनी वाणी के ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. हमें अपने चक्षुओं

पर भी उचित नियंत्रण रखना चाहिए. जिन वस्तुओं को देखने से हमारे मन

पर अशुभ प्रभाव पड़ता है, उन्हें नहीं देखना चाहिए. जो बातें हमारे मन पर

बुरा प्रभाव डालती हैं, उनसे दूर रहना चाहिए. बहुत से लोग अपने शरीर

को मजबूत बनाने के लिए कई तरह के शारीरिक व्यायाम करते हैं, किंतु

मानव अस्तित्व सिर्फ शारीरिक नहीं है. मानव अस्तित्व शारीरिक, मानसिक

और आध्यात्मिक तीनों है. शारीरिक व्यायाम भी अच्छा है, किंतु इसके

साथ-साथ हमें मानसिक व्यायाम तथा आत्मिक व्यायाम भी करना चाहिए.

अगला महत्वपूर्ण तत्व है, ‘अच्छे तरीके से कार्य करना’. जब भी हम

कोई कार्य शुरू करते हैं, तब हमें बहुत कुशलतापूर्वक और सुंदर तरीके से

उसका समापन भी करना चाहिए. हमें किसी भी कार्य को अपूर्ण अवस्था में

नहीं छोड़ना चाहिए. अगला उपदेश है स्मृति. स्मृति क्या है? इष्टमंत्र का जप

हमेशा दोहराते रहना चाहिए. हमें कभी भी परमात्मा का स्मरण करना और

अपने इष्टमंत्र का जप करना नहीं भूलना चाहिए. यह हमारा परम कर्तव्य

है. जब हम किसी संगीत की उत्कृष्ट, मनोरम स्वर लहरी को सुनते हैं, तब

हमारा विषयी मन उस संगीत में खो जाता है.

बौद्ध की बुद्धिमानी 

एक व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है. किंतु उसकी सारी उपलब्धि बेकार

हो जायेगी, यदि उसे अपने लक्ष्य की जानकारी न हो. इसलिए प्रत्येक

मनुष्य का अपना जीवन-दर्शन होना चाहिए. इसके बिना प्रगति असंभव है.

साथ ही साथ किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ आत्मविश्वास होना बहुत

जरुरी है. जैसे – ‘मैं इस कार्य को करूंगा’, ‘मुझे निश्चय ही इस कार्य को

करना है’ इस तरह का दृढ़ आत्मविश्वास ही मानव जीवन में सफलता का

रहस्य है. भगवान बुद्ध ने इसे दूसरा महत्वपूर्ण तत्व कहा है. यह सफलता

के लिए दूसरा आवश्यक तत्व है, जिसे प्रत्येक को अपने जीवन में उतारना

चाहिए. एक व्यक्ति जब जीवन के किसी भी क्षेत्र में अपने को व्यक्त करता

है, उसे अपनी वाणी के ऊपर नियंत्रण रखना चाहिए. हमें अपने चक्षुओं

पर भी उचित नियंत्रण रखना चाहिए. जिन वस्तुओं को देखने से हमारे मन

पर अशुभ प्रभाव पड़ता है, उन्हें नहीं देखना चाहिए. जो बातें हमारे मन पर

बुरा प्रभाव डालती हैं, उनसे दूर रहना चाहिए. बहुत से लोग अपने शरीर

को मजबूत बनाने के लिए कई तरह के शारीरिक व्यायाम करते हैं, किंतु

मानव अस्तित्व सिर्फ शारीरिक नहीं है. मानव अस्तित्व शारीरिक, मानसिक

और आध्यात्मिक तीनों है. शारीरिक व्यायाम भी अच्छा है, किंतु इसके

साथ-साथ हमें मानसिक व्यायाम तथा आत्मिक व्यायाम भी करना चाहिए.

अगला महत्वपूर्ण तत् है, ‘अच्छे तरीके से कार्य करना’. जब भी हम

कोई कार्य शुरू करते हैं, तब हमें बहुत कुशलतापूर्वक और सुंदर तरीके से

उसका समापन भी करना चाहिए. हमें किसी भी कार्य को अपूर्ण अवस्था में

नहीं छोड़ना चाहिए. अगला उपदेश है स्मृति. स्मृति क्या है? इष्टमंत्र का जप

हमेशा दोहराते रहना चाहिए. हमें कभी भी परमात्मा का स्मरण करना और

अपने इष्टमंत्र का जप करना नहीं भूलना चाहिए. यह हमारा परम कर्तव्य

है. जब हम किसी संगीत की उत्कृष्ट, मनोरम स्वर लहरी को सुनते हैं, तब

हमारा विषयी मन उस संगीत में खो जाता है.

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